पंडित जवाहरलाल नेहरू ने एक सपना देखा था एक ऐसी जगह का, जहाँ पर समाज का हरेक बच्चा, जात-पात, रंग-भेद, अमीरी-गरीबी को भुलाकर एक साथ विभिन्न गतिविधियों में भाग ले सके; ताकि वह अपनी क्षमताओं को पहचान सके और अपनी प्रतिभा को निखार सके। इसी सपने को हकीकत में बदलते हुए बिहार सरकार के शिक्षा विभाग के तत्कालिक प्रधान सचिव, श्री अंजनी कुमार सिंह ने 'किलकारी बिहार बाल भवन’ की स्थापना की। इसका पंजीकरण समिति पंजीकरण एक्ट 21, 1860 के तहत 30 मर्इ, 2008 को हुआ है। श्रीमती ज्योति परिहार ने किलकारी के निदेशक के रूप में जुलार्इ, 2008 से प्रभार ग्रहण किया। इसके साथ ही किलकारी की यात्रा प्रारंभ हुर्इ।
'किलकारी बच्चों की सृजनशीलता को उभारने का प्रयास करती है। 'किलकारी 08 से 16 वर्ष तक के बच्चों को सीखने के लिए स्वस्थ, तनाव रहित एवं आनन्दमयी वातावरण प्रदान करती है। यहाँ बच्चों को उनकी अभिरुचि के अनुसार प्रशिक्षण तथा प्रस्तुति के लिए अनेक मंच मिलते हैं, ताकि उनका सृजनात्मक विकास हो सके। यह 'बाल भवन’ बच्चों को उन अवसरों को उपलब्ध कराने का प्रयास करता है, जिससे वे अपने घर एवं विद्यालय में वंचित रह जाते हैं।
बच्चों के रचनात्मक विकास में सहायक अवसर एवं वातावरण प्रदान करना।
  • बच्चों की आवाज की सुनवार्इ हो।
  • उन्हें अपनी क्षमताओं को पहचानने का अवसर मिले।
  • सृजनात्मक एवं वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित हो।
  • आत्मविश्वास एवं नेतृत्व-क्षमता का विकास।
  • व्यावहारिक ज्ञान का बीजारोपण।

किलकारी का भवन एकदम अनूठा है। कहीं ऊँचा, तो कहीं नीचा है। कहीं सीढ़ी से जा सकते है, तो कहीं फिसलपट्टी से उतर सकते हैं। कहीं खुला खेल का मैदान, तो कहीं कहानी सुनने-सुनाने की छतरी। अनेकानेक प्रकार के वृक्षों से सुसज्जित परिवेश में र्इंट की जाली से छन कर आती धूप के जाल का बदलता सौन्दर्य। हर जगह सभी तरह के बच्चों की पहुँच में है| बाल भवन BaLA डिजाइन से निर्मित किया गया है। BaLA यानी कि Building as Learning Aid । BaLA के सहयोग से भवन का निर्माण कुछ इस तरह किया गया है कि बच्चों को खेल-खेल में स्वाभाविक रूप से पढ़ने-लिखने, अपनी बात व्यक्त करने, कुछ नया ढूँढ़ने एवं सृजनशीलता विकसित करने का मौका मिलता रहता है।

किलकारी में 'टायर प्लेग्राउण्ड’ का निर्माण किया गया है। इसका उपयोग बच्चे न केवल मनोरंजन के लिये, बल्कि अपने शरीर और मन को स्वस्थ रखने के लिये कर रहे हैं। पुराने टायरों से बने विभिन्न आकार-प्रकार के अनेकानेक झूलों में हर बच्चा अलग-अलग तरह से झुलने को स्वतंत्र है।